हमीरपुर। जिला के शिशुओं को डायरिया (दस्त) के घातक प्रकोप से सुरक्षित रखने के लिए जिला स्वास्थ्य विभाग ने एक व्यापक विशेष अभियान की शुरुआत की है। एक जून से लेकर 15 जून 2026 तक चलने वाले इस पखवाड़े के दौरान स्वास्थ्य कार्यकर्ताएं सीधे जनता के बीच पहुंचकर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रही हैं। अभियान के तहत शून्य से लेकर पांच वर्ष तक की आयु वर्ग के बच्चों वाले हर परिवार को लक्षित किया गया है, ताकि इस संवेदनशील उम्र के नौनिहालों को समय रहते सुरक्षा कवच दिया जा सके।
स्वास्थ्य विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस विशेष मुहिम के अंतर्गत आशा कार्यकर्ताएं सक्रिय रूप से घर-घर जाकर अपनी सेवाएं दे रही हैं। विभाग यह सुनिश्चित कर रहा है कि डायरिया से बचाव के लिए अत्यंत प्रभावी मानी जाने वाली ओआरएस (ओरल रिहाइड्रेशन साल्ट) और जिंक की दवाइयां हर उस घर में पहले से ही उपलब्ध हों, जहां पांच साल तक के बच्चे हैं। अभियान के दौरान यदि किसी भी शिशु में डायरिया अथवा अत्यधिक दस्त के लक्षण पाए जाते हैं, तो उसे तुरंत आगामी जांच और उचित उपचार के लिए नजदीकी सरकारी अस्पताल में रेफर किया जाएगा। आशा कार्यकर्ताएं दवाइयां बांटने के साथ-साथ अभिभावकों को स्वच्छता के नियमों, विशेषकर बच्चों को कुछ भी खिलाने से पहले हाथों की अच्छी तरह सफाई करने के प्रति जागरूक भी कर रही हैं।
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, शिशुओं में अत्यधिक दस्त के पीछे कई गंभीर चिकित्सीय कारण हो सकते हैं, जिनमें रोटावायरस संक्रमण के कारण होने वाला वायरल गैस्ट्रोएंटेराइटिस सबसे प्रमुख है। इसके अलावा, दूषित पानी या खराब भोजन के सेवन से होने वाले बैक्टीरियल संक्रमण (जैसे ई-कोलाई या साल्मोनेला) और दूध या किसी अन्य खाद्य पदार्थ से होने वाली एलर्जी (जैसे लैक्टोज इनटोलरेंस) भी बच्चों में डायरिया का मुख्य कारण बनती है। दस्त के दौरान शिशु के शरीर से पानी और आवश्यक लवण तेजी से कम होने लगते हैं, जिसे चिकित्सीय भाषा में डिहाइड्रेशन कहा जाता है। इस स्थिति से निपटने के लिए ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी (ओआरएस) और जिंक थेरेपी को मुख्य उपचार विकल्प माना गया है। विशिष्ट बैक्टीरियल संक्रमण की स्थिति में डॉक्टरों द्वारा एंटीबायोटिक या एंटीपैरासिटिक दवाएं भी दी जाती हैं, लेकिन विशेषज्ञों ने सख्त हिदायत दी है कि बिना डॉक्टरी परामर्श के बच्चों को कोई भी एंटीबायोटिक दवा न दी जाए।
अभियान के तकनीकी पक्षों की जानकारी देते हुए स्वास्थ्य अधिकारियों ने बताया कि ओआरएस का घोल बनाने से पहले अभिभावकों को अपने हाथ साबुन से अच्छी तरह धोने चाहिए। डब्ल्यूएचओ प्रमाणित ओआरएस के एक पूरे पैकेट को एक लीटर साफ या उबले हुए ठंडे पानी में घोलना आवश्यक है। अधिकारियों ने विशेष रूप से सचेत किया है कि एक बार तैयार किया गया ओआरएस का घोल केवल 24 घंटे तक ही इस्तेमाल के योग्य रहता है, जिसके बाद बचे हुए घोल को फेंककर नया घोल बनाना अनिवार्य है। बच्चे को हर बार दस्त या उल्टी होने पर थोड़ा-थोड़ा घोल पिलाते रहना चाहिए। इसके साथ ही, निर्धारित दिनों तक जिंक की गोलियां देने से दस्त की अवधि कम होती है और आगामी दो-तीन महीनों तक बच्चे को दोबारा दस्त होने का खतरा काफी हद तक टल जाता है।
विभाग इस अभियान के तुरंत बाद व्यापक स्तर पर ‘आईसी एक्टिविटी’ (सूचना, शिक्षा और संचार गतिविधियां) शुरू करेगा, जिसके माध्यम से डायरिया के प्रति समाज में निरंतर जागरूकता फैलाई जाएगी। इस दौरान शिशुओं को गंभीर दस्त और उल्टी से बचाने वाले रोटावायरस टीके के महत्व के बारे में भी विशेष जानकारी दी जाएगी। स्वास्थ्य विभाग ने अभिभावकों से अपील की है कि वे बच्चों को कोई भी दवा या ओआरएस देने से पहले उसके पैकेट अथवा शीशी पर उपलब्ध भौतिक लेबल, एक्सपायरी डेट और खुराक के निर्देशों की अच्छी तरह से जांच कर लें। साथ ही, डायरिया के दौरान शिशु का स्तनपान या सामान्य खान-पान कदापि बंद न करें। यदि शिशु की आंखें धंसी हुई दिखाई दें, वह अत्यधिक सुस्त हो जाए, या रोते समय उसकी आंखों से आंसू न निकलें, तो इन्हें गंभीर निर्जलीकरण का लक्षण मानते हुए तुरंत नजदीकी अस्पताल लेकर जाएं।
















