हिंदी साहित्य के जाने-माने कवि, कथाकार और उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल का मंगलवार को निधन हो गया। वे 89 वर्ष के थे और लंबे समय से उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। उन्होंने रायपुर स्थित अस्पताल में अंतिम सांस ली।
स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद अस्पताल में भर्ती
परिजनों के अनुसार, विनोद कुमार शुक्ल को कुछ समय पहले सांस लेने में दिक्कत होने पर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान मंगलवार शाम उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई, जिसके बाद डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके।
परिवार में शोक की लहर विनोद कुमार शुक्ल अपने पीछे पत्नी, एक बेटा और एक बेटी को छोड़ गए हैं। उनके पार्थिव शरीर को रायपुर स्थित उनके निवास पर ले जाया जा रहा है। अंतिम संस्कार की जानकारी परिवार द्वारा अलग से दी जाएगी।
प्रधानमंत्री और साहित्य जगत ने जताया दुख
ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात लेखक विनोद कुमार शुक्ल जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। हिन्दी साहित्य जगत में अपने अमूल्य योगदान के लिए वे हमेशा स्मरणीय रहेंगे। शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं। ओम शांति।
— Narendra Modi (@narendramodi) December 23, 2025
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई नेताओं, साहित्यकारों और सांस्कृतिक हस्तियों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि विनोद कुमार शुक्ल की रचनाएँ हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाली हैं और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी।
सादगी और संवेदना से भरी लेखनी
1 जनवरी 1937 को जन्मे विनोद कुमार शुक्ल हिंदी साहित्य के उन रचनाकारों में शामिल थे, जिनकी भाषा बेहद सरल लेकिन भावनाओं से भरपूर होती थी। उनकी रचनाओं में आम जीवन, मानवीय संवेदना और गहरा जीवन दर्शन देखने को मिलता है।
प्रमुख कृतियाँ और सम्मान उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में
‘नौकर की कमीज’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’, ‘खिलेगा तो देखेंगे’ और ‘एक चुप्पी जगह’ शामिल हैं। साहित्य के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें हाल ही में देश के सर्वोच्च साहित्य सम्मान से भी नवाज़ा गया था
साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति
विनोद कुमार शुक्ल के निधन से हिंदी साहित्य जगत को गहरा आघात पहुंचा है। उनकी रचनाएँ, विचार और संवेदनशील दृष्टि लंबे समय तक पाठकों और लेखकों को प्रेरित करती रहेंगी।
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