सिद्धिविनायक टाइम्स शिमला। हिमाचल में चल रहा आर्थिक संकट अचानक उभर कर नहीं आया—यह एक ऐसी कहानी है जिसकी पटकथा वर्षों पहले ही लिख दी गई थी। आरडीजी के समाप्त होने की चेतावनी वित्त आयोग की रिपोर्ट में साफ़-साफ़ दर्ज थी, लेकिन फिर भी सरकार ने समय रहते वैकल्पिक संसाधन जुटाने की कोई ठोस तैयारी क्यों नहीं की? क्या यह सिर्फ “खजाना खाली” का नाटक है, या फिर कुछ ऐसे निर्णय हुए हैं जिनकी कीमत अब जनता को चुकानी पड़ रही है? प्रो. प्रेम कुमार धूमल ने इस सवाल को सीधे तौर पर उठाया और कहा कि अगर सच में संकट है तो पहले गैर-जरूरी खर्चों पर रोक क्यों नहीं लगाई गई—नए चेयरमैन, सलाहकार, और सुविधाओं पर बढ़ता खर्च कहीं “राज्य के बजट का ब्लैक होल” तो नहीं बन रहा
यह भी पढ़ें:https://sidhivinayaktimes.com/youth-at-pgimer-hithours-milestone/
धूमल ने साफ कहा कि आर्थिक संकट का इलाज भाषण नहीं, बल्कि सख्त वित्तीय अनुशासन और खर्चों में कटौती है। लेकिन सवाल यह है कि जब आरडीजी के खत्म होने की जानकारी सालों पहले थी, तब सरकार ने अपने खर्च और आय के स्रोतों को क्यों नहीं बदला? क्या यह केवल भूल थी, या फिर कुछ ऐसी नीतियां अपनाई गईं जो अब राज्य को गहरे गड्ढे में धकेल रही हैं? और सबसे अहम—जब “खजाना खाली” की बात हो रही है, तब बड़ी संख्या में नए पदों की नियुक्तियां और नई गाड़ियों की खरीद किस तर्क से की जा रही है? यही वह रहस्य है जिसका खुलासा अभी बाकी है।





















