चंडीगढ़, 18 अप्रैल — असमय वर्षा के कारण पंजाब और चंडीगढ़ में गेहूं की फसल को हुए नुकसान को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने रबी विपणन सीजन 2026–27 के लिए गेहूं खरीद मानकों (Specifications) में महत्वपूर्ण छूट प्रदान की है, जिससे किसानों को बड़ी राहत मिलेगी और उन्हें किसी प्रकार की आर्थिक हानि से बचाया जा सकेगा। इस निर्णय के तहत अब 70 प्रतिशत तक लस्टर लॉस (चमक में कमी) वाले गेहूं की खरीद की अनुमति दी गई है, जबकि टूटे एवं सिकुड़े दानों की सीमा को पहले के 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया गया है। क्षतिग्रस्त एवं आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त दानों की सीमा 6 प्रतिशत ही रखी गई है। यह फैसला किसानों को मजबूरी में सस्ती बिक्री (डिस्ट्रेस सेल) से बचाने और गेहूं की सुचारू खरीद सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह कहना है भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष बिक्रम चीमा का।
चीमा ने आगे बताया कि इस संदर्भ में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और राज्य सरकार द्वारा केंद्र सरकार पर भेदभाव के लगाए जा रहे आरोप पूरी तरह भ्रामक और राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं। तथ्य स्पष्ट रूप से बताते हैं कि राजस्थान ने 2 अप्रैल को केंद्र सरकार को आवेदन भेजा और 9 अप्रैल को मंजूरी प्राप्त कर ली, जबकि हरियाणा ने 4 अप्रैल को आवेदन किया और 16 अप्रैल को उसे छूट मिल गई। इसके विपरीत, पंजाब सरकार ने 9 अप्रैल को, वह भी कथित रूप से व्हाट्सएप के माध्यम से, अपना अनुरोध भेजा। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने तेजी और जिम्मेदारी का परिचय देते हुए तुरंत फसल नुकसान का आकलन करने के लिए टीमें भेजीं। पंजाब में नुकसान का दायरा राजस्थान की तुलना में लगभग दोगुना होने के कारण प्रक्रिया अधिक व्यापक थी, फिर भी 17 अप्रैल तक लगभग 70 प्रतिशत छूट प्रदान कर दी गई। उल्लेखनीय है कि हरियाणा द्वारा पहले आवेदन किए जाने के बावजूद पंजाब को कम समय में राहत मिल गई, जो केंद्र सरकार की संवेदनशीलता और तत्परता को दर्शाता है। इससे स्पष्ट है कि देरी का कारण केंद्र नहीं, बल्कि पंजाब सरकार की स्वयं की लापरवाही और देर से की गई कार्रवाई है।
चीमा ने आगे कहा कि नीतियों का आकलन केवल वादों से नहीं, बल्कि उनके जमीनी प्रभाव से होता है। इस संदर्भ में यदि भाजपा शासित हरियाणा की तुलना पंजाब से की जाए, तो अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। हरियाणा में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के नेतृत्व में 24 फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) दिया जा रहा है, जिससे किसानों को व्यापक लाभ मिल रहा है, वहीं राज्य ने सब्जियों और फलों पर भी एमएसपी समर्थन बढ़ाकर एक व्यापक और किसान-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया है। इसके विपरीत, पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार अपने चुनावी वादे के अनुरूप सभी फसलों पर एमएसपी देने में विफल रही है और वर्तमान में एमएसपी मुख्य रूप से केवल गेहूं और धान तक सीमित है, जिनका 100 प्रतिशत भुगतान भी केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है। इसके अलावा, पंजाब में फलों और सब्जियों पर कोई एमएसपी समर्थन नहीं दिया जा रहा है, जिससे किसानों का एक बड़ा वर्ग मूल्य सुरक्षा से वंचित रह जाता है। यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि एक ओर भाजपा सरकार जमीनी स्तर पर ठोस कार्य कर रही है, जबकि दूसरी ओर पंजाब सरकार केवल घोषणाओं तक सीमित है।
अंततः, किसानों को गुमराह करना और प्रशासनिक देरी को राजनीतिक रंग देना न तो उचित है और न ही यह सुशासन का संकेत है। पंजाब सरकार को चाहिए कि वह अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करे और किसानों के हित में समयबद्ध एवं प्रभावी निर्णय सुनिश्चित करे।

















