प्रिया शर्मा, कुल्लू
5 जून 2026
5 जून 2026
कुल्लू: हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत वादियों में गर्मियों का सीजन शुरू होते ही सैलानियों की आमद तेजी से बढ़ गई है। लेकिन इसी के साथ व्यास नदी के किनारे जान जोखिम में डालने का एक खतरनाक सिलसिला भी दोबारा शुरू हो चुका है। मैदानी इलाकों से आए पर्यटक कुल्लू-मनाली में व्यास नदी के तेज बहाव और फिसलन भरी चट्टानों की परवाह किए बिना रील्स बनाने और सेल्फी लेने में मशगूल हैं। पर्यटकों की यह लापरवाही सीधे मौत को दावत दे रही है।
हर साल बढ़ रहा मौत का आंकड़ा
स्थानीय निवासियों के अनुसार, पिछले एक दशक से व्यास नदी में डूबने के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। बारिश होने के बाद नदी का जलस्तर और बहाव अचानक बेहद खतरनाक हो जाता है, जिसका अंदाजा बाहरी राज्यों से आने वाले सैलानियों को नहीं होता। नदी की चट्टानें बेहद फिसलन भरी हैं, जहां से पैर फिसलते ही तेज बहाव इंसान को संभलने का एक सेकंड का मौका भी नहीं देता। आंकड़ों की बात करें तो पिछले साल ही व्यास नदी में डूबने से 15 से अधिक लोगों की जान चली गई थी, जिनमें से लगभग 80 फीसदी हादसे सेल्फी लेने के दौरान हुए थे।
जमीनी हकीकत: न चेतावनी बोर्ड, न पुलिस की मुस्तैदी
इस जानलेवा लापरवाही के बीच सबसे चौंकाने वाली बात प्रशासन की उदासीनता है। व्यास नदी के सबसे संवेदनशील और खतरनाक स्पॉट्स—जैसे बबेली, रायसन, वामतट, भुंतर और बजौरा—पर दूर-दूर तक कोई चेतावनी बोर्ड नहीं दिखाई देता। इन जगहों पर “नदी में उतरना मना है” या “खतरा” जैसे साइन बोर्ड न होने से पर्यटक अनजाने में मौत के मुंह में चले जाते हैं। पर्यटन सीजन अपने चरम पर है, लेकिन इसके बावजूद पुलिस विभाग की तरफ से नदी किनारे गश्त, सुरक्षा अलर्ट या लाउडस्पीकर से अनाउंसमेंट जैसी कोई व्यवस्था धरातल पर नहीं दिख रही है।
प्रशासन के दावे केवल कागजों तक सीमित
हर साल पर्यटन सीजन शुरू होने से पहले जिला प्रशासन बड़ी-बड़ी बैठकें करता है। इन बैठकों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम, रेस्क्यू टीमों की मुस्तैदी, होमगार्ड की तैनाती और साइन बोर्ड लगाने के लंबे-चौड़े दावे किए जाते हैं। मगर जमीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल उलट है। आज भी युवा नदी के बीचों-बीच खतरनाक पत्थरों पर खड़े होकर जान हथेली पर लेकर रील बना रहे हैं और उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है।
स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश
प्रशासन के इस ढुलमुल रवैये से स्थानीय लोगों में गहरा गुस्सा है। ग्रामीणों का कहना है, “हम हर साल प्रशासन से मांग करते हैं कि खतरनाक जगहों पर बैरिकेडिंग की जाए और लाइफगार्ड तैनात किए जाएं। लेकिन हमारी कोई सुनवाई नहीं होती। जब कोई बड़ा हादसा होता है, तो दो दिन तक प्रशासन जागता है और फिर सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आता है।”
यदि प्रशासन ने जल्द ही इन संवेदनशील जगहों पर सख्त कदम नहीं उठाए, तो इस साल भी व्यास की लहरें कई परिवारों के चिराग बुझा सकती हैं।

















