यह प्रेस विज्ञप्ति 16 जून, 2026 को शिमला से जारी की गई है। इसमें मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने किशाऊ बांध परियोजना को लेकर हिमाचल प्रदेश के हित में मिली एक बड़ी सफलता की घोषणा की है। मुख्यमंत्री के सतत प्रयासों से नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय बैठक में पिछले आठ वर्षों से चला आ रहा वित्तीय गतिरोध पूरी तरह सुलझ गया है। इसके साथ ही ₹15,000 करोड़ की अनुमानित लागत और 422 मेगावाट क्षमता वाली इस पनबिजली परियोजना के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है, जो उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टौंस नदी पर प्रस्तावित है।
वित्तीय विवाद का समाधान और लागत का हस्तांतरण
इस बैठक में मुख्यमंत्री ने हिमाचल के हितों की मजबूती से पैरवी की। इसके परिणामस्वरूप परियोजना के विद्युत घटक (Power Component) पर आने वाली हिमाचल के हिस्से की लगभग ₹2,000 करोड़ की लागत को अब दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा जैसे लाभान्वित राज्य वहन करेंगे, जिस पर भारत सरकार ने सैद्धांतिक सहमति दे दी है। मुख्यमंत्री ने बताया कि पूर्व सरकार इसके लिए हिमाचल के कोष से ₹800 करोड़ देने पर सहमत हो गई थी, लेकिन वर्तमान सरकार ने राज्य के सीमित संसाधनों को देखते हुए इस आर्थिक बोझ को स्वीकार नहीं किया और इसे पूरी तरह खत्म करवा दिया। इस परियोजना के जल घटक (Water Component) के लिए केंद्र सरकार पहले से ही 90 प्रतिशत अनुदान दे रही है। [1]
हिमाचल प्रदेश को मिलने वाले बड़े लाभ
इस परियोजना के पूरा होने के बाद हिमाचल प्रदेश को हर साल 100 करोड़ यूनिट बिजली मिलेगी, जिससे राज्य को सालाना लगभग ₹600 करोड़ का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होगा। मुख्यमंत्री ने केंद्र के सामने दृढ़ता से यह तर्क दिया था कि चूंकि हिमाचल की जमीन इस बांध में जलमग्न होगी और यहां के लोग विस्थापित होंगे, इसलिए राज्य पर कोई भी अतिरिक्त वित्तीय भार डालना अनुचित था। केंद्र और अन्य सहयोगी राज्यों ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए हिमाचल को इस बड़ी वित्तीय देनदारी से मुक्त कर दिया है।



















