सिद्धिविनायक टाइम्स शिमला। हिमाचल प्रदेश में फोरलेन और भूमि अधिग्रहण से प्रभावित किसानों को उस समय बड़ा झटका लगा, जब प्रदेश सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की। हिमाचल प्रदेश फोरलेन संघर्ष समिति के संरक्षक ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर ने इस कदम की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि यह निर्णय लाखों प्रभावित किसानों के हितों के विरुद्ध है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 1 अप्रैल 2015 को तत्कालीन सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए निर्धारित फैक्टर-1 मुआवजा व्यवस्था को उच्च न्यायालय पहले ही अवैध करार दे चुका है और यह फैसला उनकी वर्षों पुरानी मांग की पुष्टि करता है।
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ब्रिगेडियर ठाकुर ने कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून 2013, केंद्र सरकार की नीतियों और विभिन्न राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्रों में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए फैक्टर-2 के आधार पर मुआवजा देने का प्रावधान है। इसके बावजूद प्रदेश सरकार का न्यायालय के आदेश को लागू करने के बजाय उसके खिलाफ SLP दायर करना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने आरोप लगाया कि फोरलेन परियोजनाओं से प्रभावित लोगों को न तो समय पर मुआवजा मिला और न ही पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना के लाभ, जिसके चलते उन्हें वर्षों से न्यायालयों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। साथ ही उन्होंने मंडी-कुल्लू फोरलेन सहित अन्य बड़ी परियोजनाओं से उत्पन्न पर्यावरणीय और भू-धंसाव जैसी समस्याओं पर भी चिंता जताई और केंद्र सरकार से मांग की कि रेलवे, सोलर ट्रांसमिशन लाइन और फोरलेन परियोजनाओं की व्यापक पर्यावरणीय समीक्षा के बाद ही आगे निर्माण कार्य किया जाए।





















