सिद्धिविनायक टाइम्स शिमला। शिमला से आज एक ऐसा बयान सामने आया है जिसने राज्य के वित्तीय भविष्य की तस्वीर को अचानक ही बदलकर रख दिया है—मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने कहा कि राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) की समाप्ति किसी सरकार का नहीं, बल्कि हिमाचल की जनता के अधिकारों पर हमला है, और अगर इसे हटाया गया तो राज्य का बजट एक गहरे संकट में फँस जाएगा। वित्त विभाग द्वारा दी गई प्रस्तुति में खुलासा हुआ कि हिमाचल का 12.7% बजट आरडीजी पर निर्भर है और 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट ने राज्य की आर्थिक स्थिति को इस कदर झकझोड़ा है कि अब सरकार दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री से मिलने को तैयार है, लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि भाजपा के विधायकों को इस प्रस्तुति में आमंत्रित किया गया था, फिर भी वे शामिल नहीं हुए।
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मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी कि जीएसटी के बाद कर संग्रह घटने और राज्य की कर लगाने की क्षमता छिनने से हिमाचल को सबसे अधिक नुकसान हुआ है, और अब प्रदेश को बचाने के लिए बिजली परियोजनाओं पर रॉयल्टी बढ़ाने, 40 वर्ष से अधिक के प्रोजेक्ट वापस लेने, तथा भाखड़ा-ब्यास बोर्ड की बकाया राशि व शानन प्रोजेक्ट की लीज वापसी जैसी कड़े कदमों की लड़ाई लड़नी होगी। सरकार का दावा है कि 26,683 करोड़ रुपये की अपनी आय के बावजूद संसाधन काफी नहीं हैं, और अगले वित्त वर्ष में 6,000 करोड़ रुपये का अंतर आ रहा है—क्या राज्य इस संकट से निकल पाएगा, या फिर आरडीजी की समाप्ति हिमाचल के लिए एक ऐसा मोड़ साबित होगी जहाँ से वापसी संभव नहीं?

















