शिमला: हिमाचल प्रदेश में उद्यमिता अब केवल रोज़गार का साधन नहीं रह गई है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता, सामाजिक बदलाव और स्थानीय पहचान की मजबूत बुनियाद बनती जा रही है। प्रदेश के गांवों, कस्बों और शहरों से उभर रही कई प्रेरक पहलें यह साबित कर रही हैं कि सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद स्पष्ट सोच और निरंतर मेहनत से असाधारण उदाहरण गढ़े जा सकते हैं। रसोई, खेत, जंगल, करघे और स्वास्थ्य सेवाओं से निकली ये कहानियां आज महिला सशक्तिकरण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रही हैं।
शिमला की इश्लीन कौर की यात्रा आधुनिक स्टार्टअप संस्कृति का सशक्त उदाहरण है। वर्ष 2021 में सेल्स और मार्केटिंग क्षेत्र में फ्रीलांसर के रूप में करियर शुरू करने के बाद उन्हें जल्द ही अस्थिर आय और पहचान की कमी का अहसास हुआ। हर महीने नए क्लाइंट की तलाश ने यह स्पष्ट कर दिया कि लंबे समय तक आगे बढ़ने के लिए एक व्यवस्थित और टिकाऊ मॉडल ज़रूरी है। इसी सोच से द एपेक्स इंस्टीट्यूट ऑफ लर्निंग एंड डेवलपमेंट की स्थापना हुई। आज यह संस्थान छह सदस्यों की टीम, लगभग 25 लाख रुपये के वार्षिक टर्नओवर और भारत के साथ अमेरिका, यूएई व ऑस्ट्रेलिया तक फैले नेटवर्क के साथ एक मजबूत पहचान बना चुका है।
सहकारिताओं और एनजीओ के सहयोग से एक सशक्त नेटवर्क बन चुकी है
ग्रामीण उद्यमिता की मिसाल पेश करती है अंबोटा गांव की निशु लता सूद। वर्ष 1998 में घरेलू रसोई से अचार और चटनियों के साथ शुरू किया गया उनका प्रयास आज निशु फूड प्रोडक्ट्स के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता है। पारंपरिक स्वाद को बनाए रखते हुए उन्होंने मिलेट आधारित उत्पादों जैसे नवाचार अपनाए, जिससे ब्रांड आधुनिक उपभोक्ताओं से जुड़ सका। इसके साथ ही उन्होंने विभिन्न राज्यों में महिलाओं को प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनने की राह भी दिखाई।
पर्यावरण संरक्षण और आजीविका के संतुलन का उदाहरण है ममता चंदर की पहल माउंटेन बाउंटीज़। जंगलों पर बढ़ते दबाव और ग्रामीण महिलाओं की रोज़गार समस्या को समझते हुए इस मॉडल ने स्थानीय वनस्पतियों और अधिशेष उत्पादों को मूल्यवर्धित वस्तुओं में बदला। खुबानी, रोज़हिप और बिच्छू बूटी जैसे उत्पादों ने अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भी पहचान बनाई। बीते 15 वर्षों में यह पहल महिला सहकारिताओं और एनजीओ के सहयोग से एक सशक्त नेटवर्क बन चुकी है।
खेती के क्षेत्र में ऊना जिले के अंब क्षेत्र की रीवा सूद ने एग्रीवा नैचुरली के माध्यम से रसायन-मुक्त और ऑर्गेनिक खेती को नई पहचान दी है। ड्रैगन फ्रूट, अंजीर, अश्वगंधा और स्टीविया जैसी फसलों के साथ वैल्यू एडिशन पर जोर देकर यह पहल स्वास्थ्य और वेलनेस के क्षेत्र में भरोसेमंद नाम बन रही है। खेत से तैयार उत्पाद तक पूरी प्रक्रिया पर नियंत्रण इसकी खास पहचान है।
सरकारी योजनाओं, प्रशिक्षण और मार्केटिंग सहयोग ने इन प्रयासों को मजबूती
सामूहिक प्रयास की शक्ति को दर्शाती हैं उमंग और RS फूड प्रोडक्ट्स जैसी पहलें। रीना चंदेल द्वारा शुरू की गई ‘उमंग’ आज 50 महिलाओं को स्थिर आय का जरिया प्रदान कर रही है। वहीं सोलन जिले की नीलम वर्मा ने RS फूड प्रोडक्ट्स के ज़रिये ग्रामीण महिलाओं को रोज़गार और आत्मविश्वास दिया। सरकारी योजनाओं, प्रशिक्षण और मार्केटिंग सहयोग ने इन प्रयासों को मजबूती दी।
हस्तशिल्प और हथकरघा क्षेत्र में भी हिमाचल की महिलाएं अपनी अलग पहचान बना रही हैं। गोहरमा गांव की मान दासी द्वारा संचालित ज़रिम सेल्फ हेल्प ग्रुप ने पारंपरिक ऊनी उत्पादों को राष्ट्रीय बाज़ार तक पहुंचाया है। मंडी जिले की पावना कुमारी ने पावना हैंडलूम सेंटर के ज़रिये पलायन की मजबूरी को गांव में ही सम्मानजनक रोज़गार में बदला। सोशल मीडिया के माध्यम से उनके उत्पादों की मांग राज्य से बाहर तक पहुंच रही है।
स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में बसंत आई क्लिनिक एक अलग पहचान रखता है
फैशन और हस्तकला के मेल का उदाहरण है और्निका। दुबई में स्थापित करियर छोड़कर भारत लौटी सेल्फ़न ने क्रोशिया कला को आधुनिक डिज़ाइन के साथ लक्ज़री ब्रांड में ढाला। ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षण देकर रोज़गार देना इस ब्रांड की सामाजिक सोच को दर्शाता है, जिसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सराहना मिली है।
स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में बसंत आई क्लिनिक एक अलग पहचान रखता है। डॉ. गुंजन जोशी द्वारा स्थापित यह क्लिनिक मुख्यमंत्री स्वावलंबन योजना के सहयोग से आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित हुआ और आज जिले के प्रमुख नेत्र चिकित्सा केंद्रों में शामिल है, जहां तकनीक के साथ मानवीय संवेदना को प्राथमिकता दी जाती है।
इन सभी पहलों में एक साझा संदेश है स्पष्ट दृष्टि, निरंतर प्रयास और सही सहयोग। हिमाचल की ये प्रेरक कहानियां बताती हैं कि उद्यमिता केवल आर्थिक लाभ का साधन नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और पर्यावरण के साथ आगे बढ़ने का प्रभावी माध्यम भी है। पहाड़ों से निकली ये पहलें आज पूरे देश के लिए यह संदेश दे रही हैं कि आत्मनिर्भर भविष्य की नींव स्थानीय हुनर और सामूहिक शक्ति में ही निहित है।





















