शिमला/नई दिल्ली: मनाली को लाहौल से जोड़ने वाली दुनिया की सबसे लंबी राजमार्ग सुरंग “अटल सुरंग” ने शीत मरुस्थल के रूप में विख्यात बर्फीली लाहौल घाटी की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। इस सुरंग के निर्माण से न केवल क्षेत्र में पर्यटन को नया आयाम मिला है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी उल्लेखनीय गति प्राप्त हुई है। यह उल्लेख राज्यसभा सांसद प्रोफेसर (डॉ.) सिकन्दर कुमार द्वारा लिखित पुस्तक “मोदी युग में आर्थिक सशक्तिकरण” में किया गया है, जिसका विमोचन हाल ही में उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन द्वारा किया गया।
सालभर पर्यटन सीजन, हर माह पहुंच रहे एक लाख पर्यटक
पुस्तक में बताया गया है कि अटल सुरंग के चालू होने से लाहौल घाटी में सालभर पर्यटन सीजन की शुरुआत हुई है। अब सर्दियों में भी घाटी तक पहुंच संभव हो गई है, जिससे होमस्टे, होटल, टैक्सी, स्थानीय व्यापार और रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई है। औसतन हर माह करीब एक लाख पर्यटक अटल सुरंग के माध्यम से लाहौल की ओर यात्रा कर रहे हैं।
डॉ. सिकन्दर कुमार के अनुसार, यह सुरंग लाहौल के लिए एक आर्थिक उत्प्रेरक के रूप में कार्य कर रही है, वहीं यह सशस्त्र बलों को लद्दाख के लिए एक वैकल्पिक और सुरक्षित संपर्क मार्ग भी उपलब्ध कराती है।
दूरी में बड़ी कटौती, कनेक्टिविटी हुई आसान
सीमा सड़क संगठन (BRO) द्वारा लगभग 3200 करोड़ रुपये की लागत से वर्ष 2020 में निर्मित अटल सुरंग ने मनाली–केलोंग की दूरी को 116 किलोमीटर से घटाकर 71 किलोमीटर कर दिया है। इसके साथ ही मनाली–लेह मार्ग भी 46 किलोमीटर छोटा हो गया है।
इससे लाहौल के साथ-साथ लद्दाख और सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य रसद आपूर्ति, पर्यटन और व्यापारिक गतिविधियों को बड़ी सुविधा मिली है, जिसका सीधा लाभ क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को मिला है।
विश्वस्तरीय सुरक्षा और तकनीक का उत्कृष्ट उदाहरण
वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में 10,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित सबसे लंबी सुरंग के रूप में दर्ज अटल सुरंग में अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग किया गया है। इसमें उन्नत वेंटिलेशन सिस्टम, आपातकालीन निकासी सुरंग, अग्नि नियंत्रण प्रणाली और निरंतर वायु गुणवत्ता निगरानी जैसी विश्वस्तरीय सुरक्षा व्यवस्थाएं मौजूद हैं, जो इसे इंजीनियरिंग का एक अद्भुत नमूना बनाती हैं।
पर्वतमाला रोपवे योजना से दुर्गम क्षेत्रों को नई राह
पुस्तक में यह भी उल्लेख किया गया है कि पर्वतीय क्षेत्रों में आवागमन को आसान बनाने के उद्देश्य से पर्वतमाला रोपवे कार्यक्रम के तहत अगले पांच वर्षों में 1.25 लाख करोड़ रुपये की लागत से देशभर में 250 से अधिक रोपवे परियोजनाएं विकसित की जाएंगी।
हिमाचल प्रदेश में 57.1 किलोमीटर लंबाई की 7 रोपवे परियोजनाएं प्रस्तावित हैं, जिन पर 3,232 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। इनमें पालमपुर–थात्री–छुंजा ग्लेशियर, शिरगुल महादेव–चूड़धार, बिजली महादेव मंदिर, भरमौर–भरमानी माता मंदिर और किल्लर–सच्च दर्रा जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाएं शामिल हैं।
डिजिटल कनेक्टिविटी से गांव-शहर की दूरी घटी
पुस्तक में डिजिटल कनेक्टिविटी को भी आर्थिक सशक्तिकरण का अहम आधार बताया गया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वर्ष 2015 से 2021 के बीच ग्रामीण इंटरनेट उपयोग में 200 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2024 तक देश के 95.15 प्रतिशत गांवों में इंटरनेट सुविधा पहुंच चुकी है।
भारत नेट परियोजना के तहत 2.13 लाख ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ा गया है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल लेनदेन में पिछले तीन वर्षों में 200 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है।
कौशल विकास और वित्तीय समावेशन को मिली मजबूती
पुस्तक में प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि यह ग्रामीण कौशल विकास के लिए एक गेम चेंजर साबित हो रही है। हिमाचल प्रदेश में अब तक 1,83,245 अभ्यर्थियों का चयन कर उन्हें प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता दी जा रही है।
इसके अलावा प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत देशभर में 53 करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले गए हैं, जिनमें बड़ी संख्या ग्रामीण और महिला खाताधारकों की है। हिमाचल प्रदेश में करीब 20 लाख जन धन खाते संचालित हैं।





















